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घर

घर. होता क्या है यह? एक जगह, एक मकान समुद्र के पास, जहां से किनारा साफ़ दिखाई देता हो और मंज़िलें दूर? एक  ईमारत जो ईंट और पत्थर से बनी हो और उस ईमारत की सातवीं मंज़िल पर कोने वाला फ्लैट जिस में बीस साल की कमाई का सामान भरा हो? वह २९ इंच का टीवी जो कभी किश्तों पर खरीदा था, वह शीशम के कुर्सियां और मैचिंग डाइनिंग टेबल, वह डबल डोर फ्रिज जिसमे बर्फ़ अब भी आधा-अधूरा ही जमता हो, वह बड़ा सा पलंग जिस पर लेटते ही पूरे दिन की बीती हुई घड़ियां फिर से आखों के सामने गुज़रती हो?

या कोई एहसास? अपनापन, सुरक्षा, उम्मीद, प्यार, ख़ुशी, डर, संदेह, खोखलापन, निराशा, क्रोध?

या फिर कोई इंसान? कोई अपना या वह जो किसी रोज़ अचानक पराये से अपना हो गया?

मेरे लिए घर एक ऐसी जगह है जिसे मैंने अभी तक ना देखा ना सजाया ना सामान से भरा है. वह एहसास जिसे मैंने महसूस करने की उम्मीद कब की छोड़ दी  है. वह इंसान जिससे मिलने की चाहत अब नहीं रहीमेरे लिए घर एक ऐसी जगह है जिसे मैं सिर्फ दूर से देख सकूं पर समझ पाऊं.

ज़्यादातर लोगों की ख्वाइश होती है घर बसाना और इसी तरह ज़िन्दगी के पन्ने भरते जाना.
मेरी कोशिश रोज़ यही रहती है कि मैं और एक दिन इस घरों और रिश्तों भरी दुनिया मैं बेवजह टिकी रहूँ.  

The Cloudcutter

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